हरेला पर्व क्या है? इसका पौराणिक इतिहास, महत्व और वर्तमान चुनौतियां

 

 हरेला: देवभूमि उत्तराखंड का वो लोक पर्व, जो सिखाता है प्रकृति से मोहब्बत करना (पौराणिक इतिहास और महत्व)




जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण प्रदूषण और कंक्रीट के जंगलों से परेशान है, तब भारत के एक कोने में एक ऐसी संस्कृति भी बसती है जो सदियों से साल में तीन बार सिर्फ पेड़-पौधों और हरियाली का उत्सव मनाती है।

हम बात कर रहे हैं देवभूमि उत्तराखंड के लोक पर्व 'हरेला' (Harela) की।

कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ों में मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल एक व्रत या पूजा नहीं है, बल्कि यह इंसान का प्रकृति के प्रति प्रेम, आदर और कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे बड़ा उत्सव है। आइए जानते हैं इस पावन पर्व का पौराणिक इतिहास, वैज्ञानिक महत्व और इससे जुड़ी वो बातें जो इसे बेहद खास बनाती हैं।

🟢 क्या है 'हरेला' और इसे क्यों मनाते हैं?

'हरेला' शब्द का सीधा संबंध 'हरियाली' या 'हरे रंग के दिन' से है। यह त्योहार साल में तीन बार आता है—चैत्र नवरात्र, शरद नवरात्र और सावन की संक्रांति को। लेकिन इनमें सबसे ज्यादा महत्व सावन के महीने में आने वाले हरेला का होता है।

पहाड़ों में सावन की शुरुआत के साथ ही मॉनसून अपनी पूरी रंगत में होता है। चारों तरफ पहाड़ हरे रंग की चादर ओढ़ लेते हैं। इसी नई ऋतु और नई फसल के स्वागत में हरेला मनाया जाता है। यह त्योहार सुख, समृद्धि, शांति और लंबी उम्र की कामना का प्रतीक है।

📜 हरेला का पौराणिक इतिहास: शिव-पार्वती का विवाह

हरेला पर्व के पीछे एक बेहद पवित्र और प्राचीन पौराणिक मान्यता है। देवभूमि उत्तराखंड को भगवान शिव और माता पार्वती का निवास स्थान माना जाता है।

कथा के अनुसार: सावन के महीने में आने वाला हरेला मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इसी समय के आसपास शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था।

इस दिन को यादगार बनाने के लिए पहाड़ों में लोग शुद्ध मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की खूबसूरत मूर्तियां बनाते हैं। स्थानीय भाषा में इन मूर्तियों को 'डिकारे' (Dikare) कहा जाता है। इन डिकारों को प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है और इनकी पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। लोग भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि जैसे उनका परिवार सुखी और संपन्न है, वैसे ही हर घर में खुशहाली बनी रहे।

🌾 9 दिनों की वो अनोखी परंपरा: कैसे बोया जाता है हरेला?

हरेला मनाने का तरीका बेहद वैज्ञानिक और खूबसूरत है। त्योहार आने से ठीक 9 दिन पहले (आमतौर पर आषाढ़ के महीने में) इसकी तैयारी शुरू हो जाती है।

  1. टोकरी की तैयारी: घर के मंदिर में रिंगाल (बांस की एक प्रजाति) की छोटी-छोटी टोकरियों में साफ मिट्टी भरी जाती है।

  2. सप्तधान्य (7 प्रकार के अनाज): इस मिट्टी में सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं—जैसे गेहूं, जूं (जौ), धान, मक्का, गहत, सरसों और उड़द।

  3. सूर्य की रोशनी से दूर रखना: इन टोकरियों को मंदिर के एक कोने में रखा जाता है, जहाँ सीधी धूप न पड़े। नौ दिनों तक रोज सुबह-शाम इसमें पवित्र जल छिड़का जाता है।

  4. पीला और हरा रंग: धूप न मिलने के कारण जब ये पौधे उगते हैं, तो इनका रंग हल्का पीला और हरा होता है। सावन की संक्रांति के दिन (9 या 10 दिन बाद) इन 10-12 इंच लंबे पौधों को काटा जाता है, जिसे 'हरेला काटना' कहते हैं।

🪵 'जी रया, जागी रया' — बुजुर्गों का वो अनमोल आशीर्वाद

हरेला कटने के बाद घर के बड़े-बुजुर्ग भगवान शिव को इसे अर्पित करते हैं। इसके बाद शुरू होती है सबसे खूबसूरत रस्म—घर के छोटों को आशीर्वाद देने की।

घर के बुजुर्ग हरेला के तिनकों को बच्चों के सिर, कान के पीछे और पैरों पर रखते हैं। इस दौरान एक बेहद खूबसूरत कुमाऊंनी लोक-आशीर्वाद गीत गाया जाता है:

"जी रया, जागी रया, यो दिन बार-बार भेंटने रया। स्यावै क जुक, स्याव क जस बुद्धि हो। दूब जस पनपिया, धरती जस चाकव हया...।"

इसका अर्थ है: तुम जीते रहो, सचेत रहो। यह दिन तुम्हें जिंदगी में बार-बार देखने को मिले। तुम्हारी बुद्धि सियार जैसी तेज और कीर्ति शेर जैसी हो। तुम दूब (घास) की तरह फैलते रहो और धरती की तरह विशाल और सहनशील बनो।

🧪 हरेला का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व

हमारे पूर्वज कितने समझदार थे, इसका अंदाजा आप हरेला की परंपरा से लगा सकते हैं। आज के वैज्ञानिक भी हरेला के पीछे छुपे विज्ञान को सलाम करते हैं:

  • फसल की गुणवत्ता की जांच (Seed Testing): प्राचीन काल में जब प्रयोगशालाएं नहीं थीं, तब हमारे पूर्वज 7 प्रकार के अनाज बोकर यह चेक करते थे कि इस साल कौन सी फसल सबसे अच्छी होगी। अगर हरेला के पौधे घने और लंबे उगते थे, तो माना जाता था कि इस साल खेती बहुत अच्छी होगी।

  • पेड़ लगाने की परंपरा: उत्तराखंड सरकार और यहाँ के लोग अब हरेला को 'पौधारोपण दिवस' के रूप में मनाते हैं। इस दिन हर पहाड़ी परिवार अपने खेत, आंगन या जंगलों में कम से कम एक फलदार या छायादार पेड़ जरूर लगाता है।

  •  निष्कर्ष: परंपरा और जमीनी हकीकत का आत्ममंथन

    आज जब हम वैश्विक स्तर पर 'इको-फ्रेंडली' होने की बात करते हैं, तो उत्तराखंड का 'हरेला' पर्व हमें गर्व की अनुभूति कराता है। लेकिन इस उत्सव के बीच हमें एक कड़वी जमीनी हकीकत पर भी गौर करना होगा। आज देहरादून समेत उत्तराखंड के कई हिस्सों में चौड़ी सड़कों और आधुनिक विकास के नाम पर हजारों सदियों पुराने पेड़ों को बेरहमी से काटा जा रहा है।

    यहीं पर हमारी परंपरा और वर्तमान स्थिति में एक बड़ा विरोधाभास नजर आता है। एक तरफ हम त्योहार के दिन नए पौधे लगाने का संकल्प लेते हैं, और दूसरी तरफ सालों-साल से हमें ऑक्सीजन दे रहे विशाल पेड़ों को खोते जा रहे हैं। नए पौधे लगाना बेहद जरूरी है, लेकिन वे कभी भी एक 50 साल पुराने घने पेड़ का विकल्प तुरंत नहीं बन सकते।

    हमारा विचार: हरेला पर्व हमें सिर्फ एक दिन का उत्सव मनाना नहीं सिखाता, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है। आज के समय में सच्चा 'हरेला' वही है जहां हम नए पौधे लगाने के साथ-साथ, मौजूद पेड़ों को बचाने के लिए भी आवाज उठाएं। सरकार, प्रशासन और हम नागरिकों को मिलकर 'सतत विकास' (Sustainable Development) का रास्ता चुनना होगा, जहां प्रगति भी हो और हमारी हरियाली भी सुरक्षित रहे।

    इस बार जब आप हरेला मनाएं, तो सिर पर तिनके रखने के साथ-साथ यह संकल्प भी लें कि हम अपने आस-पास के पेड़ों के रक्षक बनेंगे। क्योंकि अगर पेड़ नहीं बचेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए 'हरेला' सिर्फ किताबों और तस्वीरों तक सीमित रह जाएगा।

tazza Avalokan

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने