उत्तरायणी मेला उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का एक प्रमुख लोक उत्सव है, जो हर वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित किया जाता है। यह मेला बागेश्वर में सरयू और गोमती नदियों के पावन संगम पर स्थित बगनाथ मंदिर के समीप लगता है। जनवरी के दूसरे सप्ताह में आयोजित होने वाला यह मेला धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
🔷 उत्तरायणी मेले का इतिहास
उत्तरायणी मेला चंद और कत्यूरी राजवंशों के काल से चला आ रहा है और इसे कुमाऊं का सबसे प्राचीन मेला माना जाता है।
इस मेले का ऐतिहासिक महत्व वर्ष 1921 में और अधिक बढ़ गया, जब पंडित बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में कुमाऊं परिषद के कार्यकर्ताओं ने सरयू–गोमती संगम पर कुली बेगार प्रथा के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन किया। इस आंदोलन के दौरान मजदूरों के रजिस्टर संगम में बहा दिए गए।
वर्ष 1929 में महात्मा गांधी ने भी उत्तरायणी मेले का दौरा किया था, जिससे यह मेला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़ गया।
🔷 आयोजन स्थल और अवधि
उत्तरायणी मेला मुख्य रूप से बागेश्वर में बगनाथ मंदिर के निकट आयोजित किया जाता है। यह मेला लगभग एक सप्ताह तक चलता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं। सरयू–गोमती का संगम भगवान शिव से जुड़ा पवित्र स्थल माना जाता है। बागेश्वर के अलावा रामेश्वर, सूट महादेव, चित्रशिला और हनसेश्वर जैसे स्थानों पर भी छोटे-छोटे उत्तरायणी मेले लगते हैं, लेकिन बागेश्वर का मेला सबसे बड़ा और प्रसिद्ध है।
🔷 उत्तरायणी मेले की धार्मिक एवं लोक परंपराएँ
मकर संक्रांति के दिन प्रातःकाल श्रद्धालु सरयू–गोमती संगम में स्नान करते हैं, जिसे पवित्र और पुण्यदायक माना जाता है। स्नान के बाद बगनाथ मंदिर में शिवलिंग पर जलाभिषेक किया जाता है। यह धार्मिक अनुष्ठान तीन दिनों तक चलता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘त्रिमासी’ कहा जाता है।
इस अवसर पर कुमाऊं क्षेत्र में बच्चों से जुड़ी एक विशेष लोक परंपरा निभाई जाती है, जिसे घुघुतिया कहा जाता है। बच्चे आटे और गुड़ से बनी घुघुतियाँ (घुघुते) बनाते हैं और उन्हें कौओं को खिलाते हैं।
कौओं को बुलाने के लिए बच्चे पारंपरिक गीत गाते हैं —
“काले कौवा काले, घुघुति माला खाले”।
यह परंपरा लोक विश्वास, प्रकृति और बाल मन की सरल आस्था को दर्शाती है।
🔷 सांस्कृतिक गतिविधियाँ
उत्तरायणी मेले के दौरान स्थानीय पहाड़ी कलाकारों को विशेष रूप से मंच प्रदान किया जाता है। इस मंच के माध्यम से लोक गायक, लोक नर्तक और सांस्कृतिक दल अपनी पारंपरिक प्रस्तुतियाँ देते हैं।
यह मेला कई उभरते हुए कलाकारों के लिए अपनी प्रतिभा दिखाने का एक महत्वपूर्ण अवसर बनता है। पहाड़ी संस्कृति से जुड़े कलाकार यहाँ अपने लोक गीत, वाद्य यंत्र और नृत्य प्रस्तुत कर लोगों को अपनी परंपरा से जोड़ते हैं।
इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है, जिससे पहाड़ी संस्कृति को बढ़ावा मिलता है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है।
स्कूली बच्चे भी सांस्कृतिक कार्यक्रम और नाटकों के माध्यम से अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करते हैं। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे लोग पूरे मेले को जीवंत बना देते हैं।
🔷 खरीदारी और पारंपरिक भोजन
मेले में स्थानीय हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों की भरमार रहती है। यहाँ ऊनी कंबल, शॉल, बांस से बनी वस्तुएँ, लोहा व तांबे के बर्तन, मसाले और जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध होती हैं।
तिब्बत और नेपाल से भी व्यापारी इस मेले में व्यापार के लिए आते हैं। भोजन में घुघुतिया और पूरी जैसे पारंपरिक व्यंजन विशेष रूप से लोकप्रिय होते हैं।
उत्तरायणी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है। यह मेला आस्था, परंपरा और लोक जीवन को एक सूत्र में बांधता है। उत्तराखंड की वास्तविक संस्कृति और लोक परंपराओं को करीब से देखने के लिए उत्तरायणी मेले का अनुभव अवश्य करना चाहिए।